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14 शब्द — प्रत्येक शब्द की परिभाषा यहाँ है। जिन पर अधिक कहने योग्य है वे अपने पृष्ठ से जुड़े हैं।
ज्योतिष
jyotiṣaभारतीय ज्योतिष। शब्द का अर्थ "प्रकाश का शास्त्र" है और शास्त्रीय रूप से इसके तीन अंग हैं: गणित, संहिता और होरा। आज जिसे ज्योतिष कहा जाता है वह अधिकांशतः तीसरा अंग है।
कुंडली
kuṇḍalīजन्म कुंडली — पृथ्वी के एक स्थान से, एक क्षण में, प्रत्येक ग्रह कहाँ था, इसका आलेख। इसके लिए ठीक तीन सूचनाएँ चाहिए: जन्म की तिथि, समय और स्थान। पाठ का शेष सब कुछ इन तीन से निकलता है।
अयनांश
ayanāṃśaसायन राशिचक्र (विषुव से नापा) और निरयन राशिचक्र (स्थिर तारों से नापा) के बीच का कोण। अयन-चलन के कारण यह प्रति वर्ष लगभग 50 विकला बढ़ता है, और वर्तमान में लगभग 24° है। भिन्न अयनांश चुनने से कुंडली की प्रत्येक स्थिति खिसक जाती है — एक ही जन्म के दो ज्योतिषीय पाठों में मतभेद का यह सबसे बड़ा कारण है।
विस्तार से पढ़ें →लाहिड़ी अयनांश
lāhiṛī ayanāṃśa1955 में भारत सरकार की कैलेंडर सुधार समिति द्वारा अपनाया गया अयनांश, जो राष्ट्रीय पंचांग में प्रयुक्त है। चित्रपक्ष भी कहा जाता है, क्योंकि यह चित्रा तारे को 180° पर स्थिर करता है। यह इस स्थल का मानक है — इसलिए नहीं कि यह प्रमाणित रूप से सही है, बल्कि इसलिए कि अधिकांश भारतीय पाठ इसी को मानते हैं।
दृष्टि
dṛṣṭiकिसी ग्रह का कुंडली के अन्य स्थान पर प्रभाव। प्रत्येक ग्रह अपने से सातवें भाव को देखता है। मंगल अतिरिक्त रूप से चौथे और आठवें को, गुरु पाँचवें और नौवें को, शनि तीसरे और दसवें को; ये तीन विशेष दृष्टियाँ शास्त्रीय सात में ठीक उन्हीं ग्रहों की हैं जो पृथ्वी से बाहर की कक्षा में हैं। ध्यान दें: ज्योतिष की दृष्टि पूरी राशियाँ गिनती है, पाश्चात्य ज्योतिष अंश नापता है।
विस्तार से पढ़ें →गोचर
gocaraग्रह अब कहाँ हैं, जन्म के समय कहाँ थे इसके विपरीत। जन्म कुंडली के सापेक्ष पढ़ा जाता है, और भारतीय परंपरा में प्रायः लग्न से नहीं, चंद्र राशि से।
पंचांग
pañcāṅgaभारतीय पंचांग। नाम का अर्थ "पाँच अंग": तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। पाँच में चार सूर्य और चंद्र के कोणीय संबंध से गिने जाते हैं — इसीलिए पंचांग वस्तुतः चंद्र-सौर उपकरण है।
तिथि
tithiचंद्र दिन — चंद्र को सूर्य से 12° आगे बढ़ने में लगा समय। यह वृद्धि एकसमान नहीं होती, अतः तिथि लगभग 19 से 26 घंटे की होती है — इसीलिए वह कैलेंडर तिथि से नहीं मिलती और क्षय या वृद्धि को प्राप्त होती है।
करण
karaṇaतिथि का आधा भाग — चंद्र का सूर्य से 6° आगे बढ़ना। ग्यारह करण होते हैं, जिनमें चार स्थिर और सात चर हैं, जिससे चंद्र मास में साठ करण बनते हैं।
मुहूर्त
muhūrtaकिसी कार्य के आरंभ के लिए शुभ समय चुनना। एक विशिष्ट इकाई का नाम भी — दिन का तीसवाँ भाग, लगभग 48 मिनट। भारत में मुहूर्त ज्योतिष की सर्वाधिक प्रचलित शाखा है और जन्म कुंडली पर सबसे कम निर्भर।
कारक
kārakaकिसी विषय का द्योतक ग्रह। कुछ परंपरा से निश्चित हैं (पिता के लिए सूर्य, माता के लिए चंद्र); अन्य प्रत्येक कुंडली में अंशों के अनुसार दिए जाते हैं, जैसे चर कारक पद्धति में।
आत्मकारक
ātmakārakaअपनी राशि में सर्वाधिक अंश पर स्थित ग्रह; अधिकांश पद्धतियों में केतु को छोड़कर। जैमिनी पद्धति का केंद्रीय तत्व, जहाँ इसे कुंडली का शासक विषय माना जाता है।
अष्टकवर्ग
aṣṭakavargaएक अंक-पद्धति जो प्रत्येक ग्रह की दृष्टि से प्रत्येक राशि को बिंदु देती है, और इससे कुंडली के बलवान स्थानों का संख्यात्मक नकशा बनता है। गोचर-निर्णय में व्यापक रूप से प्रयुक्त, क्योंकि यह गुणात्मक पाठ को तुलनीय संख्या में बदल देती है।
षड्बल
ṣaḍbala"छह बल" — एक शास्त्रीय पद्धति जो प्रत्येक ग्रह को छह पृथक मानों (स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृष्टि) पर अंक देकर जोड़ती है। ज्योतिष के उन थोड़े अंगों में एक जो पूर्णतः गणितीय है, और इसीलिए अभ्यासियों के बीच पुनरुत्पाद्य।