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Houses (Bhava)

17 शब्दप्रत्येक शब्द की परिभाषा यहाँ है। जिन पर अधिक कहने योग्य है वे अपने पृष्ठ से जुड़े हैं।

  • भाव

    bhāva

    लग्न से गिने गए कुंडली के बारह खंडों में से एक। राशि बताती है *किस प्रकार* की ऊर्जा; भाव बताता है *जीवन के किस क्षेत्र* पर। अधिकांश भारतीय परंपराएँ पूर्ण-राशि भाव लेती हैं, अतः प्रथम भाव पूरी लग्न राशि है।

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  • जन्म के क्षण पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रहा राशिचक्र का बिंदु, और प्रथम भाव का आरंभ। यह लगभग हर दो घंटे में बदलता है — इसीलिए सही जन्म-समय सही जन्म-तिथि से अधिक महत्व रखता है।

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  • तनु भाव

    tanu bhāva

    प्रथम भाव। शरीर, स्वयं, ओज, रूप, और व्यक्ति किसी कार्य का आरंभ कैसे करता है। इसका स्वामी लग्नेश है और कुंडली का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है।

  • धन भाव

    dhana bhāva

    द्वितीय भाव। संचित धन, वाणी, भोजन, कुल, और जिसे व्यक्ति सँभालकर रखता है।

  • सहज भाव

    sahaja bhāva

    तृतीय भाव। छोटे भाई-बहन, साहस, पराक्रम, लघु यात्रा, हाथ और कौशल।

  • बंधु भाव

    bandhu bhāva

    चतुर्थ भाव। घर, माता, भूमि, वाहन और आंतरिक सुख। कुंडली का निम्नतम बिंदु, और वह आधार जहाँ व्यक्ति लौटता है।

  • पुत्र भाव

    putra bhāva

    पंचम भाव। संतान, सृजन, विद्या, मंत्र-साधना और पूर्व पुण्य। दो सर्वाधिक शुभ भावों में एक।

  • शत्रु भाव

    śatru bhāva

    षष्ठ भाव। संघर्ष, ऋण, रोग, नित्य सेवा और प्रतिस्पर्धा। शास्त्रीय रूप से कठिन भाव, यद्यपि बलवान षष्ठ को निरंतर परिश्रम की क्षमता भी माना जाता है।

  • कलत्र भाव

    kalatra bhāva

    सप्तम भाव। जीवनसाथी, साझेदारी, अनुबंध, और किसी भी व्यवहार में दूसरा पक्ष। लग्न के ठीक सामने, और वह जिसे व्यक्ति मिलता है — न कि जो वह है।

  • रंध्र भाव

    randhra bhāva

    अष्टम भाव। रूपांतरण, उत्तराधिकार, गुप्त विषय, अनुसंधान और अंत। शास्त्रीय रूप से आयु के लिए भी पढ़ा जाता है — यह स्थल उस प्रयोग का अनुसरण नहीं करता और उसके उपकरण नहीं बनाता।

  • धर्म भाव

    dharma bhāva

    नवम भाव। भाग्य, पिता, गुरु, उच्च विद्या, दीर्घ यात्रा और तीर्थ। कुंडली का सर्वाधिक शुभ भाव माना जाता है।

  • कर्म भाव

    karma bhāva

    दशम भाव। आजीविका, संसार में कर्म, यश और प्रतिष्ठा। कुंडली का उच्चतम बिंदु, और जिसके लिए व्यक्ति सार्वजनिक रूप से जाना जाता है।

  • लाभ भाव

    lābha bhāva

    एकादश भाव। लाभ, आय, संपर्क, मित्र और बड़े भाई-बहन। जो आता है, उसका भाव — जबकि द्वितीय वह है जो रखा जाता है।

  • मोक्ष भाव

    mokṣa bhāva

    द्वादश भाव। व्यय, हानि, विदेश, निद्रा, एकांत और मोक्ष। जो क्षीण होता है उसका भाव, और उससे मुक्ति का भी।

  • केंद्र

    kendra

    केंद्र भाव — 1, 4, 7 और 10। कुंडली की भार-वाहक संरचना माने जाते हैं: केंद्र में स्थित ग्रह प्रत्यक्ष और संसार में कार्य करता है।

  • त्रिकोण

    trikoṇa

    त्रिकोण भाव — 1, 5 और 9। कुंडली की सर्वाधिक शुभ स्थितियाँ, जो परिश्रम से अधिक पुण्य वहन करती हैं। केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी ग्रह अनेक राज योगों का आधार है।

  • दुःस्थान

    duḥsthāna

    कठिन भाव — 6, 8 और 12। शास्त्रीय रूप से संघर्ष, उलटफेर और हानि। सावधानी से पढ़ने योग्य: ये वैद्यक, अनुसंधान और संन्यास के भाव भी हैं, और इनमें ग्रह होना बुरे जीवन की कुंडली नहीं है।