रामचरितमानस

द्वितीय संस्करण की प्रस्तावना।**

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**द्वितीय संस्करण की प्रस्तावना।** गोस्वामी तुलसीदासजी की रामायण से बढ़ कर हिन्दीसाहित्य में दूसरा कोई अन्य नहीं है। ऐसा कौन साहित्य-सेवी होगा जो रामचरितमानस से थोड़ा बहुत परिचय न रखता हो? इसका आदर भारतवर्ष के कोने कोने में राजाधिराजों के महलों से लेकर कंगाल की झोपड़ी पर्य्यन्त है और प्रचार में तो यह वाल्मीकीय से भी कई गुना बढ़ा हुआ है। विविध मतानुयायी और भिन्न धर्मावलम्बी भी आदरणीय मान कर इसके उपदेशों से लाभ उठाते हैं। अनेक भाषाओं में अनूदित होकर यह भिन्न भिन्न देशों में सम्मान पा रहा है भारतीयों में तो कितने ही भावुक जन ऐसे होंगे जो रामचरितमानस का पाठ किये बिना जल तक नहीं ग्रहण करते। इसके ओजस्वी और मर्मस्पर्शी उपदेशों द्वारा असंख्यों स्त्री-पुरुष कुप्रवृत्तियों से छूटकर सदाचारी बन गये और बनते जाते हैं। रामभक्तों का तो यह सर्वस्व प्राणाधार ही है। इस लोकप्रसिद्ध महाकाव्य की अधिक प्रशंसा करना तो मध्याह्नकाल के सूर्य्य को हाथ में दीपक लेकर दिखाने के समान है। यद्यपि रामायण की रचना गोसाँईजी ने अत्यन्त सीधी सादी भाषा में की है—न तो उन्होंने जटिल अर्थ लाने का प्रयत्न किया और न कठिनाई अथवा पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिये दृष्टकूट आदि को ही स्थान दिया है, उनका ध्येय तो सरलता-पूर्वक हृद्गत भावों को व्यक्त करने का जान पड़ता है—फिर भी रामायण के अर्थ की गम्भीरता इतनी अधिक है कि न जाने इस पर कितनी ही टीकाएँ हो चुकीं और होती ही जाती हैं। असंख्यों विद्वान तरह तरह की अनोखी उक्तियों से उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, पर अन्त कोई भी नहीं लगा सका और रामचरितमानस की गूढ़ता ज्यों की त्यों बनी है। जिस प्रकार विज्ञजन अपनी मनोहर कल्पनाओं से पाठकों का मनोरञ्जन करते हैं उसी प्रकार अनभिज्ञ और प्रलापप्रिय कथक्कड़ लोग अनावश्यक अर्थों के गढ़ने में नहीं चूकते। कितने ही संशोधकों और प्रूफ़रीडरों की काटछाँट से बहुत ही पाठान्तर हो गया है तथा कुछ महाकवियों ने बीच बीच में क्षेपक और आठवाँ काण्ड जोड़ कर गोसाँईजी की त्रुटि सुधारने की उदारता प्रकट की है। किसी ने अर्द्धाली चौपाइयों को निकाल कर पिंगल की योग्यता दिखाई है और कविकृत रामायण के रूप ही को बदल डाला है। कहाँ तक कहा जाय, ऐसे ही सहस्रों विद्यावारिधियों ने रामचरितमानस में अप्रासंगिक विषयों को बलात ठूँस कर इसको खूब ही विकृत किया है जिससे मूल और क्षेपक का निर्णय करना साधारण हिन्दी जाननेवालों के लिये क्या बड़े बड़े उद्भट विद्वानों को कठिन और भ्रमोत्पादक हो गया है। इस अनर्थकारी कार्य्य में स्वार्थलोलुप पुस्तक विक्रेताओं और प्रेसाध्यक्षों का भी हाथ है। काव्य-सौन्दर्य्य भले ही नष्टभ्रष्ट होकर गोसाँईजी के सिद्धान्तों पर पानी फिर जाय, पर इससे उन्हें प्रयोजन नहीं। उनका तो स्वार्थ सिद्ध होना चाहिये, क्योंकि क्षेपक और आठवें काण्ड के बिना बहुतेरे ग्राहक उसे खरीदना पसन्द नहीं करते। इन महाशयों ने लेखकों और टीकाकारों को प्रलोभन देकर क्षेपक मिलवाया, रामायण और इसके रचयिता की मान-मर्य्यादा की परवा न करके केवल कुछ भोलेभाले पाठकों की रुचि के लिहाज़ से और अपनी बिक्री बढ़ाने के विचार से रामचरितमानस को कुजड़े का गल्ला बनाने में कोई बात उठा नहीं रक्खा। हर्ष का विषय है कि कतिपय विद्वानों ने कविकृत मूलपाठ की खोज लगाने में सराहनीय उद्योग किया और अच्छे अन्यप्रकाशकों ने उनका हाथ बँटाया। जहाँ आज से बीस पचीस वर्ष पहले क्षेपक सहित रामायण छापना श्रेष्ठ समझा जाता था, वहाँ अब क्षेपक रहित मूलपाठ की प्रति का आदर होने लगा है और क्षेपक से लोग घृणा करने लगे हैं। अपने समय के प्रसिद्ध रामायणी और परमभागवत मिर्जापुर निवासी पण्डित रामगुलामजी द्विवेदी ने गोसाँईजी के छोटे बड़े बारहों ग्रन्थों के मूलपाठ खोज निकालने में खासा प्रयत्न किया था और इस कार्य में उन्हें अच्छी सफलता प्राप्त हुई थी। उनके द्वारा संशोधित रामचरितमानस के आधार पर क्षेपक रहित गुटको के रूप में शुद्ध पाठ की रामायण सम्वत १९४१ में काशी के एक प्रेस से प्रकाशित हुई थी, हमने अपनी टीका में इसी 'गुटका' के अनुसार मूलपाठ रखा है। द्विवेदीजी के समकालीन पं॰ बन्दनपाठक, बाबू हरिहर प्रसाद और लाला छंकनलाल आदि रामायण के प्रेमियों ने इसी पाठको कविकृत विशुद्ध स्वीकार किया है। नागरीप्रचारिणी सभा के सभापति महोदय की एक टीका १९१६ ई॰ में छपी है। इसी सटीक प्रति के मूल पाठ का कहीं कहीं अवलम्बन कर अपनी टीका में हमने उसको 'सभा की प्रति' के नाम से उल्लेख किया है। सभा की प्रति में भी पाठान्तर की कमी नहीं है, इस बात का पता हमें अयोध्याकाण्ड से बहुत कुछ लगा है। गुटका का पाठ आधिकांश कविकृत पाठ से मिलता है; किन्तु सभा की प्रति का पाठ उतना नहीं मिलता। इसी प्रकार उत्तरकाण्ड में पाठान्तर की अधिकता है, जिसका यथास्थान टीका में हमने दिग्दर्शन किया है वह पुस्तकावलोकन करते समय पाठकों को विदित होगा। गोसाँईजी के हाथ का लिखा अयोध्याकाण्ड जो अब तक राजापुर के मन्दिर में सुरक्षित है, अवधवासी लाला सीताराम बी॰ए॰ ने उद्योग करके उसकी अक्षरशः प्रतिलिपि प्रकाशित करायी है। अयोध्याकाण्ड का पाठ हमने इसी प्रति अनुसार रक्खा है। अन्तर इस बात का है कि गोसाँईजी ने अवधी और वैसवाड़ी भाषा तथा उस समय की लेखप्रणाली के अनुसार राम को रामु, भरत को भरतु, जन को जनु, मन को मनु, बन को बनु, घना को घनु, इत्यादि शब्दों को मात्रायुक्त लिखा है और सुख को सुष, दुख को दुष, लखि को लषि अर्थात 'ख' के स्थान में प्रायः 'ष' का प्रयोग किया है। मोरें, तोरें, हमारें, तुम्हारें, पहिचानें सयानें आदि शब्दों पर बिन्दु लगाये हैं। उन्हो ने भाषा छन्दों में 'ण' और 'श' का बहिष्कार किया है तथा 'ब' के स्थान में अधिकांश 'व' से काम लिया है। हमने पूर्णरूप से तो इसका अनुकरण नहीं किया, वरन् वर्तमान लेखशैली के अनुसार शब्दों का रूप रक्खा है; किन्तु उससे न तो शब्द के रूप बदले हैं और न अर्थ-लालित्य में किसी प्रकार का अन्तर आया है। 'ण' और 'श' का प्रयोग हमने भी नहीं किया है। सम्भव है कि हिन्दी को चिन्दी निकालनेवाले समालोचकों के लिये यह परिवर्तन आक्षेप का कारण हो और उन्हें कुछ कष्ट उठाना पड़े, फिर भी हम इसके निमित्त क्षमा की याचना करते हैं। उपयुक्त तीनों प्रतियों के अतिरिक न तो अन्यत्र से पाठ ही लिया गया है और न अपना पाण्डित्य दर्शाने के लिये कहीं मनमाना तोड़ मरोड़ किया गया है। हाँ-अरण्यकांड में–"मरम बचन जब **सटीक रामचरितमानस** **तपस्वी गोस्वामी तुलसीदास जी (अवस्था ३६। वर्ष)** तन मन तें हरिभक्ति-रत किये निवास। राम-नाम सादर जपत, कविवर तुलसीदास॥ वेलवेडियर प्रेस, प्रयाग।प्रस॰ सीता बोला-हरिप्रेरित लछिमन मन डोला" पाठ गुटका और सभा की प्रति में है प्रथम संस्करण में हमने इसी को प्रधानता दी थी। किन्तु कतिपय रामायण के ज्ञाता विद्वानोंने उसको अशुद्ध ठहराया और बदल देने का अनुरोध किया तदनुसार पं॰ रामबकस पांडेय की प्रति का पाठ – "मरम बचन जब सीता बोली-हरिप्रेरित लछिमन मति डोली" प्रधान स्थल में इस बार रक्खा गया है। जिन समालोचकों ने पाठ तोड़ने मरोड़ने का मुझ पर दोषारोप किया है, यह उनका अन्याय हैं। मूलपाठ के बदलने का हमें कोई भधिकार नहीं, और न कहीं जान बूझ कर हमने वैसा किया है। भ्रम अथवा छापे के दोष से पाठ में कदाचित कहीं अन्तर पड़ गया हो तो यह दूसरी बात है। हमारी इच्छा थी कि रामायण के प्रथम संस्करण की प्रतियों का सर्वसाधारण के सुवीतार्थ स्वल्प मूल्य निर्धारित किया जाय; किन्तु काग़ज़ आदि की महंगाई के कारण विवश हो प्रकाशक महोदय आठ रुपये से कम उसका मूल्य नहीं रख सके, फिर भी दो वर्ष के भीतर ही एक सहस्र प्रतियाँ समाप्त हो गयीं। शीघ्रता के साथ इस खपत को देख विश्वास हो रहा है कि रामायण के प्रेमियों को यह टीका पसन्द आई और उन्होंने इसे अपनाया। इसके सिवा कितने ही प्रसिद्ध पत्रों के सुयोग्य सम्पादकों और विद्वानों ने टीका की उपयोगिता के विषय में अनूकूल सम्मति प्रदान कर उस विश्वास को और भी दृढ़ कर दिया है। पहले हमें इस बात का कुछ भी भरोसा नहीं था कि विद्वग्मण्डली में इस टीका को इतना बड़ा सम्मान प्राप्त होगा। परन्तु 'केहि न सुसङ्ग बड़प्पन पावा' के अनुसार अब मैं अपने परिश्रम को सफल समझ रहा हूँ। रामचरितमानस की टीका हमने पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिये नहीं किया और न इसी अभिप्राय से लिखने का प्रयास किया है कि हमारी टीका पूर्व के टीकाकारों से बढ़ कर होगी। वास्तविक बात तो यह है कि रामचरितमानस पर चिरकाल से हमारे हृदय में प्रगाढ़ अनुराग है और उसका कहना, सुनना मनन करना अथवा टीका लिखना एक प्रकार रामभजन कहा जाता है। यही सोच कर हमने इस कार्य को सम्पन्न करने का साहस किया और इस बात की तनिक भी परवाह नहीं की कि भाषा पर मेरा कोई अधिकार है अथवा नहीं। जब रामायण के विषय में अपना अपना विचार व्यक्त करने का स्वत्व पढ़े अनपढ़े छोटे बड़े सभी लोगों को है, तब उससे अकेला मैं ही क्यों वञ्चित रक्खा जा सकता हूँ। जो भक्तिवान प्राणी रामवश गान करते हैं वे पार पाने के अभिप्राय से नहीं वरन् उसे एक प्रकार ईश्वर का भजन समझ कर वर्णन करते हैं। दूषित दृष्टि वाले मनुष्यों को दोष ही से शान्ति मिलती है अतएव वे अपनी प्रकृति के अनुसार उसके लिये प्रयत्नशील होकर सन्तोष ग्रहण करते हैं। उन्हें स्वच्छ मानसरोवर में भी दादुर सम्बुकादि के बिना यथार्थ आनन्द नहीं आता, अस्तु। अपनी टीका में हमने इस प्रकार का क्रम रक्खा है कि मूल पद्यों (चौपाई, दोहा, छन्द, श्लोकादि) के अन्त में उनके अंक के नीचे भावार्थ लिख, उस पर मूल छन्दों का अंक देकर वह पंक्ति छोड़ दी गयी है। अर्थ के नीचे कथानकों की टिप्पणी, शङ्कासमाधान, रस, भाव, ध्वनि, अलंकार की समास अथवा व्यास रूप से व्याख्या की गयी है। प्रथम संस्करण की अपेक्षा इस बार गोस्वामाजी की जीवनी में विस्तार किया गया है। कुछ त्रुटियों का भी सुधार किया गया है। अन्त में एक मानस-पिङ्गल लगाया है उसमें मानस के समस्त छन्दों के लक्षण और उदाहरण दिये गये हैं। पाठकों के मनोरंनार्थ पूर्व की अपेक्षा इस बार कई एक रंगीन और सादे चित्र लगाये गये हैं और जिल्ल आदि की सजावट पहले से कम नहीं, अर्थात् पुस्तक को सर्वाङ्ग सुन्दर बनाने में पूर्ण उद्योग किया गया है। इतने पर भी मूल्य सर्वसाधारण के सुवीधार्थ घटा दिया गया है। इस टीका के लिखने में पंडित रामबक्स पाण्डेय और बाबू श्यामसुन्दर दास की टीकाओं से हमें कहीं कहीं अच्छे भाव प्राप्त हुए हैं तथा टिप्पणी लिखने में सहायता मिली है अतएव इन युगल महानुभावों की लता स्वीकार करते हुए उन्हें हम हार्दिक धन्यवाद देते हैं। रामायण के प्रेमी विद्वानों और रामभक्तजनों से हमारा नम्र निवेदन है कि यद्यपि शुद्धता की ओर विशेष ध्यान रक्खा गया है, फिर भी भ्रमवश या दृष्टिदोष से अथवा छपते समय मात्राओं के टूट जाने किम्बा अक्षरों के निकल जाने ले प्रायः अशुद्धियाँ हो जाया करती हैं। यदि ऐसी त्रुटियाँ कहाँ दिखाई पड़े तो उन्हें सुधार कर पढ़ेगे। जब हरिचरित्र को सरस्वती, शेष, ब्रह्मा, शिव, शनकादि ऋषीश्वर, शास्त्र, पुराण, वेदादि नेति नेति कहते हुए सदा गान करते हैं, तब उसको एक साधारण मनुष्य गान करके किस प्रकार पार पा सकता है? एकमात्र वाणी पवित्र करने और जीवन सार्थक बनाने के लिये रामयश गान किया जाता है, न कि पार पाने के निमित्त। जिसका वारापार ही नहीं, उसका कोई पार किस तरह पा सकता है? इस विषय में तो मेरी यह धारणा है कि – जल सीकर महिरज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥ भव भञ्जन गञ्जन सन्देहा। जन रञ्जन सज्जन प्रिय एहा॥ राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं॥ बिमल कथा हरिपद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥ मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥ मुनि दुर्लभ हरिभगति नर, पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरन्तर, सुनहिं मानि बिस्वास॥ सोइ सर्बज्ञ गुनी सोइ ज्ञाता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुलत्राता। रामचरन जाकर मन राता॥ **चित्र-परिचय** भिन्न भिन्न चित्रकारों के बनाये भिन्न भिन्न अवस्था के गोस्वामी तुलसीदासजी के तीन चित्र रामचरितमानस में लगे हैं, उनका परिचय ऐतिहासिक पुस्तकों और किवदन्तियों से जहाँ तक उपलब्ध हुआ वह प्रकाशित किया जाता है। (१) इस एक रंगे चित्र को बादशाह अकबर के चित्रकारों ने सम्वत् १६२५ विक्रमाव्द के लगभग, बनाया, उस समय गोसाँईजी की अवस्था ३६ वर्ष की थी और वे तपश्चर्या में अनुरक्त थे। इतिहास से पता चलता है कि बादशाह अकबर अपनी राजसभा में प्रत्येक मत के विद्वानों को रखने का अनुरागी और प्रसिद्ध महात्मा पुरुषों के चित्रों का संग्रह कर अपनी चित्रशाला सजवाने का बड़ा शौकीन था। अकबर का प्रसिद्ध वज़ीर नवाब ख़ानख़ाना गोस्वामीजी पर अत्यन्त प्रेम रखता था। बहुत सम्भव है कि यह चित्र उसी के उद्योग से बन कर शाही चित्रालय में रक्खा गया हो। पहले पहल इस चित्र को लंदन के किसी समाचार पत्र ने प्रकाशित किया और उसी के द्वारा इसका भारत में प्रचार हुआ है। (२) दूसरा चित्र बादशाह जहाँगीर के चित्रकारों ने सम्वत् १६६५ विक्रमाव्द के लगभग निर्माण किया होगा, क्योंकि जहाँगीर सम्वत् १६६२ से १६८४ विक्रमाव्द पर्यन्त दिल्ली के राज्यासन पर विराजमान था। उस समय गोस्वामीजी की अवस्था ७६ वर्ष की रही होगी। गोसाँईजी के जीवनचरित्र में लिखा है कि बादशाह जहाँगीर उनसे मिलने काशी आया था। बादशाह उनपर वड़ा प्रेम रखता और उन्हें पूज्यदृष्टि से देखता था। एकबार गोस्वामीजी भयंकर व्याधि से अत्यन्त पीड़ित हुए थे, सम्भव है कि उनकी बीमारी का समाचार पाकर वह स्नेहवश काशी आया हो और उसी समय अपने चित्रकारों को चित्र लेने की आशा दी हो, इसी से यह चित्र सद्यः रोगमुक्त अवस्था का लिया मालूम होता है। उन दिनों गोस्वामीजी प्रह्लादघाट पर पं॰ गंगाराम जोशी के यहाँ निवास करते थे। पं॰ गंगाराम गोसाँईजी के मित्रों में कहे जाते हैं, शाही चित्रकारों से मिल कर किसी प्रकार उन्होंने इस चित्र की प्रतिलिपि प्राप्त कर ली हो तो आश्चर्य नहीं। क्योंकि सुना जाता है कि उनके वंशजों के पास वह चित्र अबतक सुरक्षित है। वर्तमान काल के पं॰ रणछोड़लाल व्यास अपने को पं॰ गंगाराम ज्योतिषी का उत्तराधिकारी बतलाते हैं। उन्होंने सन १९१५ ई॰ में गोस्वामीजी की जीवनी लिखवा कर प्रकाशित करायी है और उसमें वही एकरंगा चित्र भी दिया है। व्यासजी का कथन है कि यह चित्र बादशाह जहाँगीर ने सम्वत् १६५५ में जयपुर के किसी कारीगर से बनवाया था। परन्तु उस समय तो अकबर गद्दी पर था और जहाँगीर राजकुमार था, वह तो सम्वत १६६२ में गद्दी पर बैठा था। यदि यह कहा जाय कि राजकुमार की अवस्था में ही जहाँगीर ने चित्र बनवाया तो सम्भव नहीं, क्योंकि गद्दी पर बैठने के बाद उसने गोस्वामाजी को बुलवाकर एक बार जेल में बन्द करवा दिया था। यदि वह राजकुमार की अवस्था में गोस्वामीजी का प्रेमी होता तो राज्यासन पर बैठ कर उन्हें बन्दी न बनाता। जेल में बन्द करने पर वह उनके महत्व ले परिचित हो प्रेमी हुआ और तभी मित्र बनवाने की आज्ञा दी होगी। पं॰ रणछोड़लाल का वक्तव्य इतिहास से विरुद्ध होने के कारण विश्वास के योग्य नहीं है। व्यासजी ने अपनी जीवनी में चित्र के विषय में लिखा है कि "इस चित्र की रजिस्टरी हुई है, बिना हमारी आज्ञा कोई न छापे" आप की इस अनुदारता पर हंसी आती है और घृणा भी होती है। जिस महापुरुष के दर्शन की लाससा हिन्दू-समाज के अतिरिक्त कितने ही विदेशीय सजनों के हृदय में वर्तमान है, उनके चित्र को इस प्रकार प्रतिवन्ध के साथ प्रकाशित करना संकीर्णता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है? काशी-नागरीप्रचारिणी सभा को सहस्रशः धन्यवाद है कि उसने इस चित्र को चतुर चित्रकार द्वारा रोगीपन का दोष दूर कराकर बड़े साइज़ में प्रकाशित किया है। उसकी एकरंग की प्रतिलिपि (असली चित्र के अनुसार) ज्ञानमंडल-कार्यालय ने और रंगीन आवृत्ति माधुरी ने प्रकाशित की है। इस चित्र के एक प्रधान दोष पर चित्रकार और सभाने कुछ ध्यान नहीं दिया, वह दर्शकों के लिये भ्रमोत्पादक हो सकती है। सिर पर शिखा और छोटे छोटे बाल दिखाये गये हैं, वे ऐसे जान पड़ते हैं मानों गोस्वामीजी फूलदार कनटोप दिये हों। गोस्वामीजी वैष्णव थे, वैष्णवों में बहुत काल से यह रीति प्रचलित है कि वे या तो शिखा के अतिरिक्त सिर दाढ़ी और मूंछ के बाल साथ ही बनवाते हैं और रखते हैं तो सब साथ ही, जैसा कि गोवामीजी का प्रथम चित्र है। जब दाढ़ी मूँछ में बाल की चूँटिया नहीं हैं तब सिर पर उन्हें दिखाना अयुक्त है और असली चित्र में ऐसा प्रकट भी नहीं होता है। हम लोगों ने प्रवीण चित्रकार द्वारा इस दोष को दूर कराकर रंगीन चिन्न प्रकाशित किया है। इसमें सन्देह नहीं कि खंख्या,१ और २ के दोनों चित्र गोस्वामी तुलसीदासजी के हैं, उनमें अन्तर केवल अवस्था भेद का है। (३) तीसरा चित्र ग्रियर्सन साहब ने सङ्गविलास प्रेस की रामायण में पहले पहल प्रकाशित कराया था, उसी के आधार पर वह अन्यान्य प्रेसों में भी मुद्रित हुआ है। यह ऊपर के दोन चित्रो से ठीक मिलता नहीं, इससे कल्पित होने का सन्देह होता है, किन्तु ग्रियर्सन साहब की खोज सर्वथा उपेक्षणीय नहीं है। कदाचित् नब्बे वर्ष की उमर में अत्यन्त वृद्धावस्था के कारण शरीर स्थल हो गया हो उस समय का यह चित्र लिया हो इससे मिलान न होता हो। (४) रति विलाप (रंगीन) पृष्ठ ९९ (५) शिव-पार्वती सम्वाद (एकरंगा) पृष्ठ १३१ (६) अहल्या तरण (तीनरंगा) पृष्ठ २११ (७) पुष्प वाटिका (रंगीन) पृष्ठ २३१ (८) परशुराम आगमन (एकरंगा) पृष्ठ २७३ (९) गङ्गातरण (एकरंगा) पृष्ठ ४६८ (१०) चित्रकूट-निवाल (तीनरंगा) पृष्ठ ४९९ (११) अग्निमिलन (तीनरंगा) पृष्ठ ६८४ (१२) शबरी-मिलाप (तीनरंगा) पृष्ठ ७३१ (१३) बाली-सुग्रीव युद्ध (एकरंगा) पृष्ठ ७५७ (१४) वर्षा-वर्णन (एकरंगा) पृष्ठ ७६२ (१५) समुद्रोल्लंघन (एकरंगा) पृष्ठ ७६२ (१६) अशोक वाटिका (तीनरंगा) पृष्ठ ७६५ (१७) मन्दोदरी-प्रार्थना (एकरंगा) पृष्ठ ८६६ (१८) रामसन्देश (एकरंगा) पृष्ठ ९९८ (१४) रामराज्य (तीनरंगा) पृष्ठ १०११ **विद्वानों की सम्मतियाँ** रामचरितमानस की टीका के सम्बन्ध में कतिपय प्रसिद्धहिन्दी अंगरेज़ी के समाचार पत्रों और विद्वानों की सम्मतियों का सार। **"आज" दैनिक-काशी।** टीका अच्छी हुई है और अपनी कुछ विशेषता भी रखती है। इसमें क्षेपक का नाम नहीं है। इस टीका की भाषा भी बहुत शुद्ध और वर्तमान हिन्दी है। अर्थ सरल रक्खा गया है, क्लिष्टकल्पना या आडम्बर से काम नहीं लिया गया है। अर्थ के साथ अलंकार दिया है जो कविता प्रेमियों और ऊँचे दर्जे के छात्रों के लिये अधिक उपयोगी है। सारांश यह सटीक रामचरितमानस प्रायः हर तरह से अच्छा है और संग्रह करने योग्य है। **"भारतमित्र" दैनिक-कलकत्ता।** रामचरितमानस के इस सरल अर्थ और टीका का बहुत सा अंश हम देख गये। हमारी सम्मति में यह टीका प्रामाणिक और बहुत उपयुक्त हुई है। टीकाकार ने इस टीका के लिखने में जो परिश्रम किया है वह पूर्ण सफल हुआ है और ऐसी सुन्दर टीका से रामायण के प्रेमियों का उपकार अवश्यम्भावी है। यह सर्वाङ्गसुन्दर ग्रन्थ लोकादर का पात्र और सर्वथा आहय है। **"विश्वमित्र" दैनिक-कलकत्ता।** टीका बहुत ही सरल और सुबोध भाषा में बड़ी उत्तमता से की गयी है। उसे पढ़ कर चित्त बड़ा प्रसन्न होता है। टीकाकार को अपने कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है। **"लीडर" दैनिक-प्रयाग।** इसमें मूल पाठ उत्तम, हस्तलिखित प्रतियों के मिलान से लिखा गया, क्षेपक रहित और शुद्ध है। इसकी टीका गद्य प्रचलित हिन्दी में इस प्रकार लिखी गयी है कि सामान्य पढ़े लिखे मनुष्य भी सहज में समझ सकते हैं। कथानकों के वर्णन तथा अन्यान्य टीका टिप्पणियों से इसकी उत्तमता और भी बढ़ गयी है। अन्त में रामायण के छन्दों का एक पिंगल और तुलसीदासजी की विस्तृत जीवनी विश्वस्त सूत्रों से अनुसन्धान करके लिखी गयी है। कुछ चित्रों ने पुस्तक का सौन्दर्य बढ़ा दिया है। यह पुस्स्तक हिन्दू समाज में आदर पाने के योग्यहै। **"हिन्दुस्तान रिव्यू" पटना।** जहाँ तक हमलोग जानते हैं टीका बहुत सरल है। यह रामायण का संस्करण प्रकाशक के उद्योग को सम्मान प्रदान करनेवाला और खूब प्रचार के योग्य है। **"सरस्वती पत्रिका" प्रयाग।** टीका की भाषा सरल है। मानस-पिंगल इसकी एक विशेषता है। रामायण के प्रेमियों के लिये यह भी संग्रह करने योग्य है। **भूतपूर्व सरस्वती सम्पादक पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी की सम्मति।** रामायण का यह संस्करण बहुत अच्छा निकला। टीका खूब समझ बूझ कर लिखी गयी है। ऐसी कितनी ही बात इसमें हैं जो अन्य टीकाओं में नहीं पाई जाती। अनेक जगह मैंने टीका पढ़ी और मुझे पसन्द आई। प्रेस ने उसकी मनोहरता और उपादेयता बढ़ाने में कोई कसर नहीं की है। **हिन्दी के विद्वान और सुकवि सय्यद असीरमली की सम्मति।** इसमें क्षेपक नहीं है, टीका सरल सुवोध हिन्दी में मूल के अनुसार की गयी है। खींचातानी और स्वयम् बुद्धिप्रकाश करने का टीकाकार ने न कष्ट उठाया है, न पाठकों के लिये व्यर्थ की उलझन छोड़ी है। शङ्का-समाधान किया है, पर क्लिष्टकल्पना का नाम तक नहीं है। कथान्तरों को टिप्पणियाँ भी लगी हैं। मूलार्थ के पश्चात अलंकार-रस-भाव और ध्वनि का स्पष्टीकरण कर मानो सोने में सुगन्ध भर दी है। अन्त में मानसपिङ्गल लगा दिया है, जो विद्यार्थियों के भी काम का है। गोस्वामीजी का जीवनचरित्र भी खोज के साथ लिखा गया है। साथ ही रंगीन चित्रों के लग जाने से ग्रन्थ की शोमा दूनी हो गयी है। तात्पर्य यह कि टीकाकार ने वास्तव में इस टीका के लिखने में सराहनीय परिश्रम किया है। **भारतमित्र द्वारा एक हिन्दी सेवी की सम्मति।** यह टीका मैंने खूब ध्यान से पढ़ी है। टीका बहुत ही उपादेय हुई है। भावार्थ थोड़े शब्दों में दिया गया है, जिससे जिज्ञासा को पूर्ण निवृत्ति हो जाती है। क्षेपक का नाम नहीं, मूलपाठ प्राचीन प्रतियों के अनुसार बहुत कुछ शुद्ध है। जितनी विशेषताएँ टीका में होनी चाहिये वह सब इसमें विद्यमान है। माधुरी के सत्यसेवक ने "टीका अच्छी हुई" दबी ज़बान से यही कहा, पर आगे चलकर वे मिथ्याकल्पना की और न जाने क्यों झुक पड़े। आप लिखते हैं कि इस टीका के लिखने में टीकाकार का दावा है कि हमने कवि के उद्देशानुसार ही अर्थ करने की चेष्टा की है, परन्तु टीकाकार का यह दावा विचारणीय है। ठीक है, विचारिये और बतलाइये कि यह दावा ठीक है या नहीं। शायद आपने उद्देश्य का-अर्थ कविकल्पना समझा रक्खा है, क्योंकि उद्देश्य की बात छोड़ एक ही साँस में कवि के उद्गारों के भावों की बात कहने लगते हैं और उद्देश्य को बात ही भूल जाते हैं। मूलपाठ के विषय में टीकाकार पर आक्षेप करना अन्याय है, क्योंकि जिन प्रतियों से पाठ संगह किया गया है टीका में सर्वत्र उसका उल्लेख किया गया है। अतः तोड़ मरोड़ की शिकायत व्यर्थ है। हिन्दी प्रेमियों ने इस टीका का उचित सम्मान किया है। इस प्रकार की अवहेलना करने से टीका की उपादेयता में कोई अन्तर नहीं आ सकता और न सत्यसेवकजी की सत्यसेवा का हिन्दी संसार को परिचय ही मिल सकता है। इसके अतिरिक्त-बहुत से विद्वानों की अनुकूल सम्मतियाँ प्राप्त हुई हैं जिनको स्थानाभाव के कारण हम नहीं प्रकाश कर सके हैं। छप गयी!!छप गयी!! **तुलसी-ग्रन्थावली।** गोस्वामी तुलसादासजी के ग्रन्थों के सम्बन्ध में अधिक कहने की अवश्यकता नहीं है। उनके महत्व को पढ़े अनपढ़े भारतवासी मात्र मली भाँति जानते हैं। गोस्वामीजी के बनाये हुए छोटे बड़े बारह अन्य प्रसिद्ध हैं। रामलला नहछू, वैराग्य-सन्दीपिनी, बरवै रामायण, पार्वती मङ्गल, जानकी-मङ्गल, रामाज्ञा प्रश्नावली, दोहावली, कवित्त रामायण, गीतावली-रामायण, कृष्णगीतावली विनयपत्रिका और रामचरितमानस। इन बारह ग्रन्थों को मूल मूल स्वच्छ चिकने कागज़ पर शुद्धता पूर्वक बड़े बड़े अक्षरों में हमने छपवाया है। नीचे कठिन शब्दों का अर्थ भी दिया गया है, जिससे भावार्थ समझने में बड़ी सुगमता हो गयी है। इनमें से ग्यारह ग्रन्थों की एक जिल्द है जिसमें लगभग ५८० पृष्ठ हैं। मूल्य सजिल्द केवल ४) और यह दूसरी जिल्द केवल रामचरित मानस की सचित्र और सटीक का मूल्य ४॥) और चिकने उम्दा काग़ज़ पर ६॥) है। मिलने का पता **मैनेजर बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग।** **नरेन्द्रभषण** यह एक अत्यन्त रोचक सचिन जासूसी उपन्यास है। आप ने कितने ही उपन्यास पढ़े होंगे पर नरेन्द्रभूषण के ऐसा शिक्षा प्रद और रोचक उपन्यार शायद ही कहीं पढ़ा हो। राजनीति की चातुर्य पूर्ण चालें और नरेन्द्रभूषण का अपूर्व बल और साहस तथा शान्ता का अद्वितीय प्रेम हृदय को मुग्ध तथा उछाल देने वाले हैं। फिर महन्त जी के जंगली मोह की दुष्टता और किले का अन्त में फतह होना इत्यादि यह सब २५० पृष्ठों में छपे हैं। सजिल्द पुस्तक है और मूल्य १)। शीघ्रता करिए। मनेजर, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग। छप गया!छप गया!! उपन्यास-प्रेमियों के लिए खुशखबरी! **"सन्देह"** हिन्दी उपन्यास जगत में अनूठी चीज़! गिरीश जी का 'सन्देह' नामक उपन्यास छप गया!! मधुर, मनोहारिणी, हदयस्पर्शिनी, तथा करुणा-पूर्ण प्रणयकथा के अङ्क में भारतीय क्रान्ति-कारियों की साहस-मयी क्रियाशीलता की गाथा को विललित देख कर यदि आप अपने हदय में देशभक्ति का भाव भरना मानव-चरित्र के अध्ययन से उत्पन होने वाले अलौकिक आनन्द का अनुभव करना तथा विधि-विधान की प्रबलता का पता पाकर सांसारिक विषादों से विकल अपने चिस को संतोष देना चाहते हैं तो भूतपूर्व मनोरमा-सम्पादक पं॰ गिरिजादत्त शुक्ल "गिरीश" बी॰ ए॰ के इस नवीन उपन्यास को अवश्य पढ़िए। 'सन्देह' के पृष्ठों में कहीं राजा आत्मानन्द साहेब की नीचता-पूर्ण खैरख्वाही को देख कर आप कुढ़ेगे तो कहीं रजनी कुमार के प्रति कान्तार बाला और किरण कुमारी के प्रेम-द्वन्द को अवलोकन कर नारी-हृदय की विस्मयोत्पादिनी विचित्रताओं का परिचय प्राप्त करेंगे; कहीं कान्तार बाला की सहानुभूति, सञ्चारिणी असफलता से आप दुखी होंगे तो कहीं रजनीकुमार द्वारा उसकी हत्या तथा आत्महत्या से आप विकल हो जायेंगे, कही क्रान्ति-कारियों द्वारा राजा साहेब की गिरफ्तारी आदि का रोचक वृत्तान्त पढ़ कर आप के मन में रजनीकुमार और किरण कुमारी के विवाह की आशा अङ्कुरित होगी तो कहीं कान्तार बाला और रजतीकुमार की रथियों के पीछे हृदय-विदारक स्वर में उनका जयघोष सुनकर आप का हदय बैठ जायगा। कभी कभी हमारी सदिच्छाओं से ही कितने भयङ्कर परिणाम प्रस्तुत हो जाते हैं, कभी कभी व्यर्थ ही सन्देह करके हम कितना अनिष्ठ कर बैठते है; यदि इस सत्य का जीता-जागता चित्र देखना हो तो 'गिरीश' जी के इस उपन्यास को अवश्य पढ़िए। मूल्य सजिल्द १।) साधारण।॥) मिलने का पता— मैनेजर, **बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग।** छप गई!छप गई!!!छप गई!! **हिन्दी संसार में एकदम नवीन झलक** **लोक सङ्ग्रह** (अथवा) सन्तति विज्ञान यह हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट लोक-प्रिय पुस्तक हमारे कार्यालय से, प्रकाशित होगई है। इसमें लेखक ने गृहस्थाश्रम में रहते हुये सन्तानोत्पादन विषय पर आलोचना करते हुये एक अपूर्व झलक दिखलाई है। कहीं २ पर साधारण बातों को लक्ष करके ऋषिवाक्यों द्वारा पढ़नेपाले महानुभावों पर उनके सूत्रों का अच्छा भाव दिखलाने का प्रयत्न किया है। सन्तति शास्त्र तथा कोकशास्त्र से कितना घनिष्ट सम्पर्क है–(प्राचीन ऋषियों ने स्त्रियों के कामदेव की गति का ज्ञान क्यों कर प्राप्त किया था,) कोकशास्त्र से संबन्ध रखने वाली गुप्त बातों का दिग्दर्शन भली भाँति कराया गया है। पुस्तक की छपाई सफाई के विपय में हम आप से कुछ नहीं कहना चाहते। ऐसी उपादेय पुस्तक में सवा दो सौ पृष्ट होते हुये भी अधिक प्रचार के कारण मूल्य लागत मात्र केवल ।॥) ही रक्खा गया है पुस्तक समी के काम की वस्तु है। धड़ाधड़ मांगें आ रही हैं। जिसकी खोज आप वर्षों से कर रहे थे वह अब अल्प समय में ही आपके हाथों में रहेगी। अस्तु हमारा आप से अनुरोध है कि आप इसे तुरन्त मंगा लें अन्यथा दूसरे संस्करण के लिये आपको घाट देखनी पड़ेगा। भाषा ऐसी मनोहर है कि देखते ही बन पड़ता है। यदि सत्य ही उक्त बातों के जानने की आपको इच्छा है, तो आप आज ही एक कार्ड हमें लिख दीजिये ताकि हम पुस्तक भेज कर आप की मनोनीति इच्छा पूर्ण करने में समर्थ हो सके। पता– **मनजर, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग।** This work is in the public domain in the United States because it was first published outside the United States (and *not* published in the U.S. within 30 days), **and** it was first published before 1989 without complying with U.S. copyright formalities (renewal and/or copyright notice) **and** it was in the public domain in its home country on the URAA date (January 1, 1996 for most countries). 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रामचरितमानस — Everyone · DharmSetu